राज राजेश्वर सहस्त्रार्जुन महाराज का परिचय
8/31/2011 8:45:09 AM
सृष्टि के रचयिता ब्रम्हा जी के मानस पुत्र मरीच से कश्यप और अदिति से सूर्य की उत्पत्ति हुयी। सूर्य से वैवस्वत मनु की उत्पत्ति हुयी। पुराणों के अनुसार मनु आर्यों के प्रथम पूर्वज थे। पौराणिक इतिहास के अनुसार मनु के ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु और पुत्री इला थी। इक्ष्वाकु से सुर्यवां का विस्तार हुआ। मनु ने पुत्री इला का विवाह चन्द्रमा के पुत्र बुध से किया। बुध से ही चन्द्रमा का विस्तार हुआ। इला के नाम पर मातृगोत्र से यह 'ऐल वां के नाम से भी सुविख्यात हुआ। बुध और इला से पुरूरवा का जन्म हुआ। महाराज पुरूरवा ने ऐलवां की प्रतिस्थापना प्रतिष्ठानपुर वर्तमान में इलाहाबाद में की और उसे राजधानी बनाया ।

महाराज पुरूरवा का विवाह उर्वशी से हुआ और उनके आठ पुत्र हुये जिनमें आयु और अमावस प्रमुख थे। आयु ने स्वर्भानु की प़ुत्री प्रभा से विवाह किया और उनके पॉंच पुत्र हुये जिन में ज्येष्ठ पुत्र नहुष थे। महाराज नहुष बहुत ही प्रतापी थे और उनकी छह संताने हुयी जिनमें यति और ययाति प्रमुख थे। यति मुनि हो गये और राज्य का त्याग कर दिया। ययाति को राज्य का उत्तराधिकार प्राप्त हुआ। राजा ययाति बङे पराक्रमी धर्मनिष्ठ सत्यवादी एवं प्रजापालक थे।

ययाति की दो रानियॉं थी। प्रथम भार्गव ऋषि शुक्र उषना की पुत्री देव यानी और द्वितीय दैत्यराज वृश पर्वा की पुत्री शमिष्ठा। देवयानी से यदु और तुर्वसु तथा शमिष्ठा से द्रुह, अनु और पुरु नाम के पॉंच पुत्र हुये। ययाति ने अपने राज्य को पॉंच प़ुत्रो में बॉंट दिया जिस कारण ययाति से पॉंच राजवंशों का उदय हुआ। यदु से यादव राजवंश, तुर्वसु से तुर्वस, द्रुह से द्रुह, अनु से आनव और पुरू से पौरव राजवंश का विस्तार हुआ। ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को चंबल-वेतवा और केन नदियों का मघ्यवर्ती राज्य दिया। महाराज यदु के पॉंच पुत्र हुये जिनमे सहसतजित, क्रौत प्रमुख थे।

महाराज सहसतजित के पुत्र शतजित थे। शतजित के तीनों पुत्र हैहय, वेणुघ्य और हय बड़े ही पराक्रमी और धर्मात्मा थे। महाराज हैहय के चरित्र और वीरता के कारण ही उनके वंशज हैहयवंश वंशज विख्यात हुयें। महाराज हैहय से धर्मनेत्र उत्पन्न हुये। धर्मऩेत्र का विवह उल्कादेवी से हुआ और इनकी राजधानी माहेश्वरपुरी थी। राजा धर्मनेत्र से राजा कीर्ति उत्पन्न हुये। राजा कीर्ति का पुत्र साहंजि हुये। साहंजि का विवाह चंपावती से हुआ और इनके पुत्र का नाम माहिमान था। माहिमान अपने पिता के बाद राजगद्दी पर बैठे और अपनी शूर वीरता से दक्षिण प्रदेश का बहुत सा भाग अपने राज्य में मिला लिया। इनके द्वारा विजित प्रदेश में आर्य संस्कृति और सभ्यता का खूब प्रचार हुआ और दिग्विजयी आर्य नरेशों के इतिहास में इनका स्थान सुविख्यात है। दक्षिण प्रदेश में काफी दूर तक राज्य फैल जाने के कारण सुविधा की दृष्टि से महाराज माहिश्मान ने नर्मदा नदी के किनारे माहिश्मती नगरी बसाई और उसे ही अपनी राजधानी बनायी।

यह नगर वर्तमान समय में जिला ऩिर्माण में मान्धाता के नाम से प्रसिद्ध है। इनकी रानी का नाम सुभद्रा था। राजा माहिश्मान के प्रतापशाली पुत्र भद्रसंन हुये। इनकी रानी का दिया थी। इस समय तक हैहय वंशियों का राज्य काशी तक फैल चुका था। हैहय एवं काशी कुलों की परस्पर स्पर्धा में दिवोदास के साथ हुये युद्ध में भद्रसेन के पुत्रों का वध कर दिया गया किन्तु भद्रसेन का एक पुत्र दुर्दम जीवित बच गये और कालोपरान्त राजा दुर्दम ने दिवोदास को पराजित करके अपने भाइयो के वध का प्रतिशोध लिया। राजा दुर्दम और इनकी महारानी ज्योतिश्मती से राजा कनक (या धनद) उत्पन्न हुये।

इनके द्वारा विजित प्रदेश में आर्य संस्कृति और सभ्यता का खूब प्रचार हुआ और दिग्विजयी आर्य नरेशों के इतिहास में इनका स्थान सुविख्यात है। दक्षिण प्रदेश में काफी दूर तक राज्य फैल जाने के कारण सुविधा की दृष्टि से महाराज माहिश्मान ने नर्मदा नदी के किनारे माहिश्मती नगरी बसाई और उसे ही अपनी राजधानी बनायी।

राजा कनक के चार सुविख्यात पुत्र कृतवीर्य, कृतौजा, कृतवर्मा और कृताग्नि हुये। राजा कनक के ज्येष्ठ पुत्र कृतवीर्य उनके पश्चात राज्य के उत्तराधिकारी बने। वे पुण्यवान प्रतापी राजा थे और अपने समकालीन राजाओ मे वे सर्वश्रेष्ठ राजा माने जाते थे। इनकी रानी का नाम कौशिक था। महाराज कृतवीर्य से कार्तवीर्य अर्जुन उत्पन्न हुये। इन्हे सहस्त्रार्जुन के नाम से भी जाना जाता है महाराज कृतवीर्य के पश्चात कार्तवीर्यार्जुन (सहस्त्रार्जुन) जी राजगद्दी पर बैठे। महाराज कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्त्रार्जुन) जी का जन्म कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को श्रावण नक्षत्र में प्रात: काल के मुहूर्त में हुआ था। पौराणिक ग्रंथो में कार्तवीर्य अजुर्न के अनेक नाम अंकित है जैसे सहस्त्रार्जुन, कृतवीर्य, नन्दन, राजेश्वर, हैहयाधिपति, दषग्रीविजयी, सुदर्शन, चक्रावतार, सप्तद्वीपाधि आदि। महाराज कार्तवीर्यार्जुन जी के राज्याभिषेक में स्वयं दत्तात्रेय जी एवं ब्रम्हा जी पधारें। राजसिंहासन पर बैठते ही उन्होने घोषणा कर दी कि मेरे अतिरिक्त कोई भी शस्त्र -अस्त्र धारण नही करेगा। वे अकेले ही सब प्रकार से अपनी प्रजा का पालन और रक्षा करते थे। युद्ध दान धर्म दया एवं वीरता में उनके समान कोई नही था।



by....Raj Singh Haihayvanshi

प्रदीप कसेरा के द्वारा प्रेषित
   
 
 
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